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मलय सागर में अब हमें चीन की साजिशों के खिलाफ एक स्पष्ट संदेश देने की जरूरत है-इंद्रेश कुमार
August 20, 2020 • A.K.SINGH

वेबिनार  : स्वतंत्र, खुला और समृद्ध हिंद प्रशांत क्षेत्र व चीन की चुनौतियां

इंद्रेश कुमार

  • हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में चीन की आक्रामकता का काउंटर-क्षेत्रीय सुरक्षा व आपसी साझेदारी पर जोर
  • क्षेत्रीय सुरक्षा की आपसी साझेदारी और हिंद प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता का प्रयास
  • हिंद-प्रशांत क्षेत्र की मजबूती चीन के बढते आक्रामक प्रभाव का काउंटर

 

नई दिल्ली : राष्‍ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच (फैन्स) की ओर से शनिवार को हिंद प्रशांत क्षेत्र में चीन की आक्रामक नीति का समाधान (इंडो पेसिफिक रीजन: चाइना कंटेनमेंट पॉलिसी) को लेकर एक देशव्‍यापी वेबिनार आयोजित किया गया।इस वेबिनार को संबोधित करते हुए फैन्स के राष्ट्रीय संरक्षक व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल सदस्य श्री इंद्रेश कुमार ने कहा किफैन्स की ओर से 74वीं स्वतंत्रता दिवस मनाने के पश्चात आज की यह तरंग गोष्ठी काफी अहम है। विभाजन के बाद भारत अब ऐसे मोड पर आ गया है, जहां वर्षों से लंबित कई अहम मसलों का समाधान संभव होता नजर आ रहा है। राम जन्मभूमि विवाद का समाधान शांतिपूर्वक होना इस बात का बडा संकेत है।

माननीय इंद्रेश कुमार जी- -

       हिंद-प्रशांत क्षेत्रमें चीन की कुटिल चाल को लेकर हमें सजग रहने एवं इसके खिलाफ एक वैश्विक अभियान चलाने की जरूरत है। चीन ने अब तक अनेक देशों की जमीन कब्जाई है। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को झांसे में लेकर तिब्बत सहित अनेक देश हड़प लिए।कैलाश मानसरोवर को भी जबरन कब्जा लिया। पिछले कुछ सालों से पाकिस्तान में विकास के नाम पर वहां कब्जे के लिए निरंतर प्रयास कर रहा है। साथ ही साथ नेपाल को भी झांसा देकर उसे अपने पाले में करने के लिए जुटा है। उन्होंने कहा कि नेपाल की मौजूदा वामपंथी सरकार चीन की एक तरह से गुलाम हो गई है। भारत के खिलाफ नेपाल का अनर्गल प्रलाप भी चीन की साजिश का ही एक हिस्सा है। अपनी विस्तारवादी अभियान में यह चीन का एक और क्रूर चेहरा है।चीन हमेशा से एक विस्तारवादी देश रहा है, इसके लिए वह किसी देश के लोकतंत्र को भी कुचलने से बाज नहीं आता है। उसने अब तक कई देशों के मौलिक अधिकारों का हनन किया है।

     चीन जिसे दक्षिण चीन सागर कहता है वास्तव में वह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मुक्त समुद्री व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र है। ज्ञात रहे कि पहले यह पूर्वी-सागर व मलय-सागर कहलाता था।यह सागर जलवायु समेत कई मामलों से उन्नत है।अब चीन इस सागर में अपना वर्चस्व साबित करने में जुटा है। मलय सागर में अब हमें चीन की साजिशों के खिलाफ एक स्पष्ट संदेश देने की जरूरत है।

      इन क्षेत्रो को लेकर पूर्व की तुलना में अब भारत के रुख में अधिक स्पष्टता है। इससे निपटने के लिए मीडिया के माध्यम से दुनिया भर में चीन की साजिश के खिलाफ प्रचार अभियानछेड़ने की जरूरत है। ताइवान, तिब्बत और हांगकांग को यूनाइटेड नेशन के अंदर एक स्वतंत्र देश के तौर पर मान्यता दी जानी चाहिए। इसके लिए भी जन आंदोलन की जरूरत है। चूंकि इन देशों में चीन की दमनकारी नीतियां अब किसी से छिपी नहीं है। चीन के उत्पात, क्रूरता एवं उसके फैलाव को सीमित करने के खिलाफ दुनिया के देशों को अब एक साथ आना होगा।

    कोरोना वायरस चीन के लैब में तैयार किया गया बायो हथियार है। यही कारण है कि दुनिया के अधिकांश ताकतवार देश अभी तक कोई वैक्सीन बनाने में विफल रहे हैं। चीन का असली रूप दुनिया के सामने आ चुका है।

चीन की मौजूदा नीति मानव जाति के लिए संकट एवं घोर चुनौतीपूर्ण है। यदि चीन, भारत को पराजित करेगा तो यह दुनिया के लिए संकट बन जाएगा। दुनिया के देश आज भारत के साथ इसलिए हैं, चूंकि उन्हें पता है कि भारत ही इस चुनौती की काट है।क्योंकिअभी तक चीन की विस्तारवादी नीति का भारत ने डटकर सामना किया है।

चीन पर अंकुश लगाने के लिए उसकी आर्थिक कमर को तोडना बेहद जरूरी है। इसी को ध्यान में रखकर भारत को अब अपने आत्मनिर्भर होने की दिशा मे काफी गंभीरता से पहल करनी होगी, जिसकी शुरुआत इस महामारी के साथ आई चुनौतियों के दरम्यान शुरू हो चुकी है।चीन की विस्तारवाद व दमनकारी नीति, दादागिरी किस तरह अमानवीय है, इसका दंश आज कई देश झेल रहे हैं। यह मानवता के खिलाफ है। इसे विश्व की मीडिया में लेकर जाने की जरूरत है। चीन की साजिश एवं कुटिलता, एक दिन दुनिया को जरूर समझ में आएगा।

21वीं सदी में भारत की भूमिका काफी निर्णायक रहेगी। वैश्विक शांति को लेकर दुनिया की निगाह अभी से भारत की ओर है।आत्मनिर्भरता पर जोर देना होगा।अपने संसाधनों को बढाना होगा। हर मायने में आत्मनिर्भर बनना होगा। भारत के गांवों में भरपूर रचनात्मकता एवं कौशल है, उन्हें संजोकर एक दिशा देनी होगी और उनके कौशल का सम्मान करते हुए उन्हें अपनी जरूरतों के अनुसार निखारना होगा। तभी नए भारत का जन्म होगा।भारत ही विश्व को मानवता का पाठ पढ़ा सकता है। भारत मेंही विश्व का नेतत्व करने की क्षमता है। 

गोलोक बिहारी राय (संगठन महामंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच ) - -

हिंद प्रशांत क्षेत्र में आज चीन की वजह से नई परिस्थिति पैदा हो गई है। चीन काफी आक्रामकता के साथ अपनी विस्तारवादी नीति को आगे बढ़ा रहा है। उसकी फितरत हमेशा आक्रमण से विस्तारवाद की रही है। मौजूदा चीन पूर्व की शताब्दियों में कभी इतना बडा चीन नहीं रहा है। पूर्व में यह महज पांच राज्यों-- तंग राज्य, पूर्वी वू राज्य(सुन वू), सुहान, सोओबेई व चू राज्य का समूह था।

साल 2007 में एक चतुष्कोणीय क्वॉड बनाया गया। इसका मकसद आपदा परिस्थितियों के लिए समुद्री क्षमताओं के बेहतर समन्वय के लिए किया गयाथा।आजक्वाड की गतिविधियां- कनेक्टिवटी, सस्टेनेबल डवलपमेंट, काउंटर टेररिज्म, मेरीटाइम व साइबर सिक्युरिटी तथा मानवतावादी आपदा प्रक्रिया तंत्र का निर्माण करना है। आज चीनकी आक्रामकता चिंता का विषय बन गईहै। हालांकि क्वॉड अब एक व्यापक आर्थिक, सामरिक गठबंधन का हिस्सा बन चुका है। साल 2017 के बाद की स्थिति मेंभारत की अब इसमें एक अहम भूमिका है। भारत के नेतृत्व मेंअमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और भारत के बीच चार देशों का गठजोड़ चीन की विस्तारवादी नीति को जवाब देने के लिए तैयारहो रहा है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की एक बड़ी भूमिका मानते हुए बीजिंगहिन्द-प्रशांत क्षेत्र जिसे वह दक्षिण चीन सागर कहता है, में अपने आपको मजबूत करने में जुटा है। 2017में सभी चार सदस्यों (अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और भारत) नेहिंद-प्रशांत क्षेत्रमें चीन के आक्रामक रवैये से निपटने के लिए गठबंधन को दोबारा सक्रिय किया।तब से इन चारों देशों का गठजोड़ स्वतंत्र और खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्रको बढ़ावा देने के मकसद से सामनेआया है।

हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता के चलते समान विचारधारा एवं समान मूल्य वाले देशों में क्षेत्रीय एकजुटता को बढ़ावा मिला है| इस क्षेत्र में समान विचारधारा वाले देशों को एकजुट होने पर जोर दिए जा रहा है| इस क्षेत्र में चीन की बढती दिलचस्पी के कारणएक क्षेत्रीय गठबंधन की रुपरेखा तय की जा रही है, जोकि क्षेत्रीय स्थिरता एवं शांति के लिए आवश्यक है।

 

डॉ जगन्नाथ पांडा (रिसर्च फेलो, आईडीएसए)- -

चीन आज एक आक्रामक ताकत बनकर उभरा है। भारत की तुलना में चीन की आर्थिक, सैन्य ताकत काफी ज्यादा है। भारत, जापान व अमेरिका के प्रति चीन की नीति काफी आक्रामक है। मोदी सरकार के आने के बाद राष्ट्रीय सुरक्षापर अब काफी जोर दिया जा रहा है। वहीं, चीन-पाक की ओर से उत्पन्न

खतरे को देख भारत अब सीमा पर काफी सख्त स्टैंड ले रहा है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की जो मौजूदा विदेश नीति है, वह हमें भविष्य की चुनौतियों को लेकर आगाह कर रहा है। बीते कुछ समय में चीन के साथ कई सीमा विवाद सामने आए हैं। डोकलाम, गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ झडप की जो घटनाएं हुईं, वह चीन का भारत के प्रति एक सोची समझी आक्रामक नीति का हिस्सा है। भारत को इसके लिए तैयार रहना चाहिए। भारत को लेकर चीन की नीति में पीएलए का काफी प्रभाव रहा है। 

हालाँकि अब चीन, भारतको गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है। नेपाल, पाकिस्तान को अपने चंगुल में लेकर चीन अब नई रणनीति बना रहा है। साथ ही सीमा क्षेत्र में स्थितियों को काफी जटिल बना रहा है। इससे स्पष्ट है कि चीन का सीमा को लेकर जो नजरिया है,वह काफी आक्रामक होने वाला है। हिन्द-प्रशांत क्षेत्र ही चीन के लिए एक कमजोर कड़ी है। इसको ध्यान में रखकर भारत कोअपने नौसैन्य ताकत (नेवलपावर) को बढाना होगा। हिंद-प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ अच्छे संबंध स्थापित करने होंगे।

 

प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली (एसआईएस जेएनयू) - -

साल 2017 से दक्षिण चीन सागर में चीन की आक्रामकता काफी बढ़ती गई। चीन इस पूरे क्षे़त्र को अपने कब्जे में करने की कोशिश में है। इसलिए चीन ने इस क्षेत्र में मिसाइल, बाम्बर आदि तैनात किए हैं। इस क्षेत्र में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए सैन्य संसाधन व नेवल संसाधनों को भी विकसित कियाहै । इसे काउंटर करने के लिए अब कदम उठाए जा रहे हैं। भारत, जापान व अमेरिका ने मिलकर एक मेरीटाइम एग्रीमेंट किया है ताकि इसकी चुनौतियों से निपटा जा सके। हिंद-प्रशांत क्षेत्र से भारत के हित काफी गहरे जुड़े हैं और चार जगहों पर समुद्री इंफ्रास्ट्रक्चर को डेवलप कर रहा है। भारत अब इस क्षेत्र में मजबूती से अपने कदम बढा रहा है। 

श्री कोटामल्लिकार्जुन गुप्ता (डाक्टोरियल कैंडिडेट) - -

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन काफी आक्रामक रुख अपनाए हुए है। ऐसे में भारत को डिजिटल टेक्नोलाजी को उन्नत कर चीन का काउंटर करने पर पहल करनी चाहिए। इस क्षेत्र में चीन की चुनौतियों से निपटने के लिए हमें अमेरिका के नवीनतम सैन्य संशाधानों की जरूरत है। इस क्षेत्र के लिए अमेरिकी विदेश नीति काफी हद तक उसके खुद के व्यापारिक गतिविधियों पर निर्भर करेगी।हमें इस पर निगाह रखनी होगी।