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कश्मीर का मामला कुछ अलग ही था-आलोक श्रीवास्तव
January 31, 2020 • मैकुनिशा श्रीवास्तव

नया कश्मीर
आलोक श्रीवास्तव
अनुच्छेद 370 हटने के साथ ही कश्मीर में एक नए युग का आरंभ हुआ है। यह एक ऐसा युग है जो अतीत से नितांत भिन्न है।
    भारत को जब आजादी मिल रही थी उस समय कुल 542 रियासतें थीं। सभी रियासतों ने भारतीय संघ में मिलना स्वीकार कर लिया था, सिवाय उन तीन रियासतों के जिनके नाम थे - जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर।
         भारत के 'लौह पुरुष' कहलाने वाले सरदार पटेल ने यह तय कर रखा था कि किसी भी रियासत को भारतीय संघ से अलग नहीं होने देंगे और ऐसा उन्होंने किया भी।
        जूनागढ़ में जनमत संग्रह हुआ और बहुमत से जूनागढ़ संघ भारतीय संघ में सम्मिलित हो गया। हैदराबाद के निजाम ने पृथक् हैदराबाद का स्वप्न देखा था किंतु उनकी यह आकांक्षा फलीभूत नहीं हो सकी और भारतीय सेना ने हैदराबाद की ओर बढ़ना प्रारम्भ किया। परिस्थितियों को देखते हुए निजाम हैदराबाद ने विलय पत्र पर अपने हस्ताक्षर कर दिए।
           कश्मीर का मामला कुछ अलग ही था। जूनागढ़ और हैदराबाद सीमावर्ती रियासतें नहीं थीं किंतु कश्मीर की सीमा पाकिस्तान से लगी थी। अतः कश्मीर में पाकिस्तान के हस्तक्षेप का भय विद्यमान था। पाकिस्तान ने कश्मीर के राजा हरिसिंह से वार्ता की। हरिसिंह ने जब पाकिस्तान में मिलने से इंकार किया तो उसने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। भयभीत हरिसिंह दिल्ली आये और उन्होंने कश्मीर के भारतीय संघ में विलय का प्रस्ताव रखा। पंडित नेहरु के अनिर्णय की मनोवृत्ति और कश्मीर के प्रमुख नेता शेख अब्दुल्ला के हस्तक्षेप से तत्कालीन परिस्थितियों में एक अनपेक्षित प्रकरण का उदय हुआ और वह था अनुच्छेद 370 का लागू होना।
         यह अनुच्छेद 370 ही था जिसने कश्मीरियों को शेष भारत से अलग कर दिया और ऐसे में पृथकतावादियों को अवसर मिल गया। बड़ी संख्या में कश्मीरियों पंडितों का पलायन हुआ और कश्मीर आतंकवाद के अंधकार में डूबने के लिए अभिशप्त हुआ।
           वर्ष 2019 में हुए आम चुनाव में जनता ने एक सशक्त सरकार के पक्ष में अपना मत दिया। नयी बनी  सरकार ने जनता के मनोभाव को समझने में विलंब नहीं किया और वर्षों से विवाद का कारण बने अनुच्छेद 370 का उन्मूलन कर दिया गया।
         आज कश्मीर अनीच्छेद 370 से मुक्त है। अब एक नया कश्मीर बन रहा है। एक ऐसा कश्मीर जो विकास के असीमित अवसर लेकर आया है।
       कल तक कालीन निर्माण , केसर की खेती और पर्यटन पर निर्भर रहने वाले कश्मीर में अब विभिन्न उद्योग-धन्धे लगेंगे और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आगमन होगा। रोजगार के व्यापक अवसर उपलब्ध होंगे और समृद्धि आयेगी। शनैः-शनैः आतंकवाद अतीत की बात हो जायेगी। कश्मीरी पंडित अपने-अपने घरों को लौट जायेंगे और सूफियों की पवित्र धरती कश्मीर एक बार पुनः सद्भाव और सौहार्द्र के सुमधुर संगीत से गुंजायमान हो जायेगी।

   शेष भारतीयों से कश्मीरियों का मेल-मिलाप होगा और राष्ट्रीय स्वर-लहरियाँ कश्मीर की फिजाओं में उल्लास के रंग घोल देंगी। चिनार के पेड़ों पर आशाओं के नए फूल खिलेंगे और कश्मीर की वादियों में एक नए सवेरे का उदय होगा।