ALL State International Health
अश्वत्थामा के माथे का घाव.......पढ़े एक मार्मिक कविता
February 1, 2020 • A.K.SINGH

*देवतुल्य*

पहले औषध से लगते वे लोग
जो दरअसल
ज़ख्म होने आते हैं जीवन में .. .. ।
लुटाते हैं खूब वाहवाही
उसके साधारण- सी प्रस्तुति पर
बार-बार उसके हुनर से
उसे अवगत करा,
आम से ख़ास होने का
भरसक अहसास कराते हैं।

अनेकानेक मुद्दों पर बात कर अन्त में,
प्राप्त कर लेते हैं
उसका पसन्दीदा विषय
प्रशंसा और हौसला अफ़जाई से
वे पा लेते हैं निकटता
और बन जाते हैं उसके
प्रेरणास्रोत और पथ- प्रदर्शक.....

और जब पूर्ण निर्भरता पा लेते हैं
तो मोड़कर मुँह
उपेक्षा और अनदेखियों का
पुरष्कार देते हैं।

अब वे औषध लगाने वाले देवतुल्य
बन जाते हैं,
अश्वत्थामा के माथे का घाव
कि तुम,
रिसते रहो...
दुखते रहो...
तड़पते रहो...
और जीते रहो....

गोलोक विहारी राय(राष्ट्रीय महामंत्री राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच )